How to balance emotions and intellect

How to Balance Emotions and Intellect 


how to balance emotions and intellect by nature mantra


जब लड़कियां छोटी होती है, तभी से एक शिक्षा शुरू हो जाती है कि पराये घर जाना है ,ज़रा सी तहज़ीब सीखो । अक्सर यही तो माँ अपनी बेटी को सिखाती है । एक परायेपन का दिखावा शुरू हो जाता है । ये मत करो, वो मत करो, ऐसा नहीं बोलते, वैसे कपड़े नहीं पहनते , घर कि अंदर रहो लोग क्या सोचेंगे ,वगैरह । यही बातें सारी उम्र ही चलती रहती है और जब लड़की ससुराल जाती है ,तो वहाँ भी यही सब सीख देते नज़र आते है मानो जैसे कोई घर से सीख कर आया नहीं और सबने ठेका लिया है ,दूसरों को सिखाने का ।लड़की फिर भी  सोचती है ,चलो ,अब तो ये मेरा घर है अब तो कोई मेरी सुनेगा ,पर कहाँ, कहते है ना मुकम्मल जहाँ भी किसी को आज तक मिला है ।

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ससुराल में आते ही सभी अपने मन की करवाते है जैसे मानो कोई फ्री का नौकर मिल गया हो । पति भी अपनी मनमानी में व्यस्त और ससुराल भी । फिर जब आप उनकी बातें नहीं मानते तो आपको एक ही बात सुन ने को मिलती है, "जा अपने बाप के  घर ,जा यहाँ तेरी मनमानी नहीं चलेगी, ये हमारा घर है और यहाँ पर हमारा हुक्म ही चलेगा "। बाप के घर जायो वे भी समझौते को ही बोलेंगे ,बस ! बेटा वही आपका घर है, रहना तो वही है न ,अब तो अर्थी के साथ ही उस घर से नाता टूटेगा "।अब दिल पे हाथ रख बोलना , ऐसा होता है कि नहीं  ??? होता है न । जिस घर में बचपन बीता वो अपना नहीं ,यहाँ शादी हुई वो भी अपना नहीं तो अपना घर है कौन सा ? 


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हर लड़की के मन में यही विचार आते है ,जो उसके अपने भी पराये बन जाते  है, फिर वो किसे अपना कहे ,महज एक रिश्ते के लिए और १०० रिश्ते निभाओ, तब भी कोई गलती हुई तो आपके किए सारे अच्छे काम भी मिट्टी में मिल जाते है ।



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ज़रुरत है अपने मन को समझने की । बहुत सी लड़कियां सिर्फ वही करती है जो दूसरे करते है । अगर माँ बाप ने कह दिया, शादी करनी है तो बस शादी ही करनी है ।पति ने कह दिया बच्चे ,तो बच्चे ही करने है । जैसे आपका ,अपना तो दिमाग है ही नहीं ।जब हम दूसरों के दिमाग से चलने लगते है तो अपने लिए हम क्या जी रहे है । किसी के दिखाए रास्ते , आपको कभी भी  आपकी  मंज़िल तक नहीं पहुंचा सकते । अपनी प्रतिभा को पहचाने ,सबसे पहले खोज अपने अंदर कीजिये कि हमें क्या और क्यों करना है, किसको खुश करना है, अपने आप को या दूसरों को । किसी के हाथ की कठपुतली न बने ,यहाँ  पर जो सीधा होता है वही ठोक दिया जाता है । मतलब सीधे इंसान को हर कोई बेवकूफ बना सकता  है ।


mera ghar konsa hai by nature mantra


पहला प्यार अपने आप को प्यार कीजिये । जब आप आत्मनिर्भर हो जायेंगे यकीन मानिये जो लोग आपको  घर की दोहाइयाँ देते है वह भी फक्र के साथ कहेंगे हमारी ही बहु या बेटी है ,इस से ही तो ये घर है। 


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आत्मनिर्भरता और शिक्षा आपका पहला हक़ और आपकी पहली पहचान है जब आप शिक्षा ग्रहण करते है तो आपको समझ आने लगती है कि  आपको क्या और कैसे करना है,ज्ञान आपको मानसिक रूप से मजबूत बना आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है ,जब आप आत्मनिर्भर बन कंधे से कन्धा मिला ,अपने जीवन साथी का साथ देती है ,ज़िम्मेवारी को निभाने में उनकी मदद करती है तो ,आपका जीवनसाथी भी आपकी कदर करता है,एक सुस्त और बेरोजगार बहु ,बेटी को सब बोझ ही समझते है अगर बेटी कमाने वाली है ,तो पिता भी उसे बोझ नहीं समझता , न ही उसको जल्दी शादी करने की फ़िक्र सताती  है क्योंकि वो जान जाते है कि  आत्मनिर्भर बेटी के लिए ,उसकी बराबरी का और उसकी  कदर करने वाला ही वर ढूंढ़ना  है ,ससुराल में भी सास को अपना बेटा  ही मेहनती नज़र आता है ,और जब आप घर के खर्च के लिए पैसे मांगती है तो उनको भी बुरा लगता है कि सिर्फ कमाने वाला बेटा  ही है और बहु खर्च पर खर्च किये जा रही है पर जब आप बराबर अपनी ज़िम्मेवारी निभाएगी तो आप भी उन्हें बोझ नहीं लगेंगी और न ही उन्हें ये कहने का दोबारा मौका मिलेगा, तो आज से ही अपनी पहचान बनाइये और बदलते नज़रिये को महसूस कीजिये क्योंकि आत्मनिर्भरता ही किसी का नजरिया भी बदल सकती है ।